सिगरेट

चार उँगलियों और

दो होठों को चूमती सिगरेट

घुप कोहरे में जली

बनी मशाल और अंगार

अंगीठी सी तपी

सर्द साँसों में थमी

वो आग ना बुझी

बढ़ी चीड़ के जंगलों में गुम

हसीन स्याह रात,

जुगनुओं सी टिमटिमाती

खिड़कियों से टपकती

शहद सी रोशनी

आख़िरी कश

डोमिनो की सीढ़ियाँ,

बिखरी तेज लाव सी

फैली सैलाब सी, फिर रुकी कहाँ

लफ़्ज़ ख़ामोश हैं आज की शाम,

पलकें कहाँ झुकीं

एकटक देखती झाँकती

दिल का फैला विस्तार

हर ज़र्रा जैसे कह रहा,

कहाँ रुकेगी यह दास्तान

जब बुझी नहीं कहकशाँ की राख सी

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