पिंज़रे का पंछी – मुखबंध

माँ की चोंच ने चूमा
पोषण, ममता, आनंद विभोर
फिर हुयी वो फुर


गर्जना, पंखों की जैसे आँधी का इक शोर
घोंसला नहीं, जैसे मंथन सृष्टि का
और मैं, पंछी सुषुप्त अवचेतन और मन

नन्हा, गिरा तिनकों के घर से
हल्का, बंद आँखों उस ने देखा
अंधा गलियारा, जो खींचे बिन डोर


सिसका, डर से रत्ती बन बैठा
रुयी, वसुंधरा सिकुड़ी, जैसे माँ की गोद
कोमल, बन विराट, हृदय करता शोर

बरसों, काल, युग बीते, मिनटों में
जिसे माँ जाना, ना वो लौटी,
सहोदर, ना चिमटे गरमाहट को,

मुड़ूँ किस ओर
जीवन, क्या यही है भाग्य मेरा
चिरप्रतिक्षा, ना दिन, ना संध्या, ना भोर

आहट, चाप ग़र्जना, भयभीत, पखेरू प्राण
करुणांजलि, रक्तारुण हथेली ने सहलाया
अवरुद्ध, सनादती साँसों ने पाया नवानन्द


जैसे लाल मणि रतन पाए लालच खोर
चाल, तत्काल, त्वरित पदम, नवस्फूरत
खग शिशु, शुचि चित्त चला पुलकित प्रभोर

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