पहाड़ों का जन्म: एक स्तुति
कभी समय की साँसें भी नहीं चलती थीं। प्राचीन ऋषि हिमालय की नंगी चट्टानों पर बैठे, आँखें बंद, देह पत्थर-सी अडिग। उनके शरीर एवं आत्माएँ वसुंधरा में रचती बस्ती रहीं, युगों युगों तक। फिर एक रात, आकाश द्वैदीप्यमान हुआ। उनकी तपस्या से पंचतत्वों के समावेश ने उन्हें पर्वतों के रूप में एक शाश्वत रूप दिया। नंदा देवी की चोटी उनका मुकुट बनी, त्रिशूल उनकी तलवार, और गंगोत्री उनके निर्वाण की अश्रुधारा। ये पहाड़ मानवता के लिए माँ बने —हरी घाटियाँ, ठंडी नदियाँ, जंगल की गोद—-ममता के दैवीय प्रतिरूप। पर उनकी शांति पवित्र थी। इसे भंग किया तो पहाड़ों ने आपदाओं को जन्म दिया—धरती का कंपन, नदियों का तांडव, मृत्यु की छाया।
बीरोंखाल की पुकार: मेरी यात्रा
मैं दिल्ली की धूल में जन्मा, एक गढ़वाली, जिसके सपनों में पहाड़ों की फुसफुसाहट बची थी। मेरी धमनियों में कुछ था जो खून नहीं था। पर मेरी ज़बान उसे कोई नाम ना दे सकी।देती भी कैसे? मातृभाषा गढ़वाली जो नहीं जानती थी। फिर एक दिन, मैं बीरोंखाल की ओर चला—पौड़ी गढ़वाल की उस रहस्यमयी धरती की ओर, जहाँ नयार नदी गुनगुनाती है।
गाँवों का झुंड, थलीसैंण की छाया में बिखरा, मुझे बुला रहा था। खस आए—वैदिक चरवाहे, उनकी भेड़ें घाटियों में मून मून मई गातीं। और राजपूत—रावत, नेगी, बिष्ट—मुगल तलवारों से भागते, यहाँ शरण लेते रहे। पर मेरे मन में तो बस एक ही सवाल था—“पंथरी”, कौन थे ये? “पंत” ब्राह्मण, जो महाराष्ट्र की आग या बनारस के घाटों से आए, या पंवार राजपूत, जिनके कदम तेजरी से यहाँ ठहरे? शायद उनकी छाया पंजाब के एक गाँव, पंथेर को भी छू कर आई। जहाँ सूतलज की लहरें उनकी भी कहानी फुसफुसाती है। मैं ढूंढने निकला—उन मूल आत्माओं को, जिन्होंने पहाड़ों की गोद में जन्म लिया, और जिन्होंने मुझे ग्राम घनश्याली में जन्म दिया ।
पर पहाड़ों की आँखें मुझे देख रही थीं।
उदगम: आग और रहस्य
ऋषियों की पावन छाया ने कई जातियों को जन्म दिया, जिनका सीधा या बिखरा सा नाता मुझसे है।भोटिया बर्फीले बुग्यालों में जन्में और उत्तराखंड में कई छेत्रों में फले फुले—पिथौरागढ़, चमोली, उत्तरकाशी—तिब्बत की राहों पर ऊन और नमक ढोते। राजी जंगलों में पनपे—पिथौरागढ़, चंपावत—“वनरावत” कहलाए। थारू तराई में खिले—खटीमा, ऊधम सिंह नगर—शायद राजस्थान से आए। जौनसारी ढलानों पर नाचे—देहरादून, और चकराता में। बुकसा जंगलों में बसे—नैनीताल के आसपास। उनके दिन कई रंगों के गीत थे—भोटिया का ऊन बुनना, थारू का “होरी” नृत्य, जौनसारी की “बरादा नाटी”। पर जंगल कटे, नदियाँ को अवरुद्ध किया गया, पहाड़ों ने आँखें खोलीं। 1803 में, चमोली में धरती फटी—गाँव डूबे, सैकड़ों मरे। फिर 1894 में, अलकनंदा उफनी—मृत्यु का तांडव घटित हुआ। इन आपदाओ को प्रकृति का रोष कहा जाये या, ऋषियों की चेतावनी। यही है उत्तराखंड—-जहाँ चोटी है वहीं घाटी भी।
हाथों का संगीत
प्राचीन काल से ही इन जाति समूहों ने सादगी और सरलता को अपना प्रारब्ध माना। उनके निश्छल हाथों ने सुख में और दुख में कला को कुल्हाड़ी—खुरपी की तरह अपनाया।
भोटिया के ऊन के कालीन, ठंड में गर्मी को संजोते रहे। राजी की लकड़ी की मूर्तियाँ, जंगल की आत्मा का निवास बनी। थारू के बांस की टोकरियाँ, जीवन के अनगिनत रंगों से भरी। जौनसारी के ताँबे के बर्तन, “हंसुली” की चमक से खनकी। बुकसा की चटाइयाँ, सादगी की गवाही देती हैं आज भी।
खूब ढूँढने पर भी बीरोंखाल के मेरे पूर्वजों के कुछ ही अवशेष देख पाया हूँ—अगर ब्राह्मण, तो शायद एक लोटा, अगर योद्धा, तो एक तलवार—आज तक हमारी पीढ़ी में गुंजन करती हैं।
पर ये सीमित सम्पदाएँ भी सुरक्षित नहीं थे। 1790 में, गोरखाओं ने आग लगाई—मंदिर जले, बीरोंखाल की शांति टूटी। पहाड़ों ने देखा, और बाढ़ भेजी—हमलावर बह गए।
एक डग पंजाब के पन्थेर की तरफ़
क्या पंथरी नाम की हवा पंजाब तक गई या वहाँ की महक यहाँ ले आई? पंजाब का एक गाँव—-शायद पंधेर या पंथेर, सूतलज के किनारे—मेरे आधे नाम की खोयी गूँज लिए खड़ा था। शायद कुछ पंथरी, बीरोंखाल से थककर, मैदानों की ओर चले। वहाँ जाटों के बीच, वे पुजारी बने या सिपाही।
पर 18वीं सदी में, गोरखाओं ने राह रोकी—तलवारें चलीं, खून बहा। पहाड़ों ने देखा, और बाढ़ भेजी—हमलावर मिट गए। पंथरी की कहानी धुंध में छिपी, पर उनका नाम बचा रहा।
आज का तांडव: विविधता और खतरा
पिछले सौ सालों में, पहाड़ों ने देखा—लोग तलहटी में उतरे। गढ़वाली, कुमाऊँनी, तराई की नर्म मिट्टी में बसे। मैदानों से लहरें चलीं—पंजाबी ढोल लिए, बंगाली मिठास लिए, हिंदी की गहराई लिए—ऊधम सिंह नगर, हरिद्वार में। खेत हरे हुए, बाजार गूँजे। भोटिया की शॉल, अब बंगाली साड़ी से बतियाती है, थारू का बांस पंजाबी जट्टी से के हाथों में मचलता है। पिछले शताब्दी का यह एक नया राग था, विविधता का चित्र।
पर सवाल गहरा है—क्या मैं उनसे हूँ? 2011 की गिनती कहती है, 2.89% जनजातियाँ हैं। एक अनुमान के अनुसार 50-60% आबादी में इन जनजातियों का अंश है।
आईना देखता हूँ तो एक शख़्स दिखायी देता है जो भारतीय महाद्वीप में कहीं भी जन्म हो सकता है । फिर क्यों कहूँ के में गढ़वाली हूँ? उत्तराखंड के उन सभी प्रवासियों के मन में जो देश के अन्य भागों में बस गए हैं एक ही द्वंद है। भाषा जानते हैं—-गढ़वाली या कुमाउनी—-तब भी आप देव भूमि की किसी शाखा के एक सूखे पत्ते की तरह हैं जिसमें हरियाली का अंकुर अब भी फूट रहा है। अगर भाषा नहीं बोल सकते तो अपने जड़ों को ढूँढने की यात्रा पुनः प्रारंभ करें।
अंतिम पुकार: सिलसिले का संकट
मैं बीरोंखाल में खड़ा हूँ, सोचता हूँ—मेरा नाम, मेरी जाति, मेरा वंश मुझे कितना पहाड़ी बनाता है? पर यह मायने नहीं। मैं उस सिलसिले की आखिरी कड़ी नहीं बनना चाहता, जो उत्तराखंड से जुड़ा है। खतरा मंडराता है—यह रिश्ता टूटेगा। हम विलुप्त हो जायेंगे, और हमारा साझा इतिहास, हमारी संस्कृति का एक टुकड़ा मिट जाएगा। मैं बिना निशानी दिए बग़ैर नहीं जाना चाहता, जब तक के मेरे बस में हो। हम सब मिट सकते हैं, पर जब तक स्मृति जिंदा है, मैं नहीं चाहता कि पीढ़ियाँ भूल जाएँ कि वे कहाँ से आए। मैं नहीं चाहता कि वे भूल जाएँ कि वे कौन हैं, और मैं कौन हूँ।


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