कैसे छुप्पा चांद

क्या चाँद खामोश है,

या छुप्पा है आज आसमान ।

ठंडी रातों को साँसों में सुलगता छोड़,

आहें बस होठों तो छू भर कर लौट आयें,

मैं और कुछ नहीं माँगता, न ज्यादा, न कम।

धुँध सा आलिंगन, समेटे कुछ मासूम से पल,

चले हम नंगे पाँव, भीगी मिट्टी छोड़,

जंगली घास की ओर बढ़ते चले बहते जाएँ

एक चंचल नदी, जो ले जाए जाने किस घर ।

वक्त जो अभी जन्मा नहीं, आज अभी बिखरा पर गया नहीं ।

चल दबे पाँव, कहीं रात जल्दी न जाग जाए

बस चुप्पी थाम, हाथों के हाथ

शायद आज आफताब आ जाए।

सुन के शोख़ धड़कन, कहीं गहरे में थिरकी,

एक लहर उठी तूफ़ान सी, खुशी के अंजाम सी

अब जियें के तर जायें, सब कुछ हासिल है यहाँ

कल, चाँद कहीं और चमकेगा,

नील नभ आकाश, फूले कपास के फूलों से

साँस लेते आशीष, छोड़ते एक दीर्घ अवकाश

दूर घिरे काले बादलों से उमड़ती सफेद चांदनी

चंदन आभा, सागर की हवा सा कर रही इंतज़ार

एक नई सुबह, एक नया जीवन,एक नया आलिंगन।

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