सुबह की पहली किरण जब
चढ़ती है आसमान छूती इमारतों पर,
नीचे फुटपाथ पर चींटियों की कतार
जैसे हम, बिना नाम-ओ-पते के
जोड़ती हैं टुकड़े-टुकड़ा अपना भाग्य
एक ऐसे नाटक में जो कोई देख नहीं पाता।
हर चींटी का एक ही काम
रोज़ का एक टुकड़ा ढूँढना,
चावल का दाना, चीनी का कण,
और बसाना अपना छोटा-सा घर
धरती के एक कोने में।
ठीक वैसे ही जैसे हम
स्टेशन की भीड़ से दफ़्तर की खामोशी तक
ढोते हैं सपनों का भारी बोझ,
हर दिन एक नई लड़ाई लड़ते हैं।
चींटी कभी नहीं थकती—
बारिश के कीचड़ में, धूप की जलन में,
वह बनाती है रास्ते,
पेचीदा रास्ते जो कहीं भी पहुँचा दें
उस एक दाने तक, उस एक जगह तक।
हम भी शहरी रेल की आवाजाही में
चुपचाप सैनिक बनकर चलते हैं,
लोहे के इस चमकदार डब्बे में
अपने टूटे-जुड़े सपनों को समेटे।
रात होते ही
चींटियाँ लौटती हैं अपने छुपे घरों में,
हमारे ही आस-पास बसे,
ठीक उसी तरह
हम भी लौट आते हैं
अपनी छोटी-सी रहने की जगह पर
बिना किसी शोर-शराबे के,
बस बच्चों की हँसलाहट
और चाय की केतली की आवाज़ में।
चींटियों की ये कहानी
हमें याद दिलाती है
कि शहर चाहे कितना भी बड़ा हो,
इंसान और चींटी की राहें
मिट्टी के एक ही ढेले से बँधी हैं।
हम छोटे-छोटे लड़ाके हैं,
जिन्हें रोज़ अपनी टूटी हुई चादर
सिलनी है नई उम्मीद के धागों से।
और फिर भी,
जैसे चींटी का जज़्बा
नहीं डगमगाता
अपने कठिन रास्तों पर,
वैसे ही हमारा हौसला
नहीं टूटता इस शहर की भीड़ में—
हर शाम नई सुबह की कल्पना करके
हम अपना टुकड़ा-टुकड़ा सुख बनाते हैं,
अनगिनत अनजान साथियों के संग
इस शहर की अनसुनी कहानी में।


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