भरोसा

तुम्हारे चेहरे पर
सुबह का एक दिया जलता था,
जैसे आफ़ताब नूर बनकर ढल गया हो
उन दिनों तुम्हारी धुप की महक
से साँसें भी पाकीज़ा थीं

फिर मैंने बस इतना ही तो पूछा था,
‘ये जो हथेलियों पर जमीं हुई दुआएँ हैं,
ये किस पते पर पहुँचेंगी?’

एक छोटा सा सवाल था…
स्याही की एक बूँद जैसा…
तुम्हारे भरोसे के कोरे कागज़ पर
जो गिर, घर कर गया था।

और वो लौ जिस से कभी
घर का आँगन रोशन था …
शाम बन कर बिखर गया

आँखों पर जो नमी थी,
वो सूख कर गर्द हो गई,
गीली मिट्टी पर
धूप का पत्थर पढ़ गया था ।

तुम्हारी पेशानी पर
एक लकीर सी खिंच गई…
जैसे दो मुल्कों के बीच,
सरहद का बीमार पसर गया था

तुम्हें यक़ीन चाहिए था,
बिना सबूत का।
एक अंधी आस्था का
और मुझे सच की तलाश थी।

बस इतनी सी बात पर,
तुम्हारे दिल का वोह रास्ता,
अब एक गहरी खाई में बदल गया था ।

भरोसा, पैरों के नीचे
काँच के टुकड़ों सा बिखरा गया है।
उठा नहीं सकते, चल नहीं सकते,

बस अपनी-अपनी जगह खड़े हैं…
और ज़मीन बहुत ठंडी हो चली है।

Leave a comment