माँ की चोंच ने चूमापोषण, ममता, आनंद विभोर फिर हुयी वो फुर गर्जना, पंखों की जैसे आँधी का इक शोर घोंसला नहीं, जैसे मंथन सृष्टि काऔर मैं, पंछी सुषुप्त अवचेतन और मन नन्हा, गिरा तिनकों के घर सेहल्का, बंद आँखों उस ने देखाअंधा गलियारा, जो खींचे बिन डोर सिसका, डर से रत्ती बन बैठा रुयी,
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