उल्टी गिनतियों से बेकरार
जड़ें उखड़ते, साँसें थमती
कहकशाँ जाने को तैयार
ज़मीन नर्म, खुलती मीठे घाव की तरह
जकड़े जिन्हें रखा सदियों तक,
आज आँसु भी बर्फ से पिघले किस तरह
उढ़ चले वो दोस्त, जब ज़मीन बेबस लाचार
खिलौनों से घर टिमटिमाते सुर्ख फूलों की तरह
यह सर्द रात चमकती तारों की तरह
बढ़ता रहा खामोशी का खुमार इस तरह
वो धूप जो ना आग है पर चुभती तीर की तरह
ऐंठन सी दौड़ती, बेक़रारी थामें किस तरह
रूह मेरी काँपती, टूटे दिल की धड़कन की तरह
दूर फर्श ढलता रहा, उमड़ता रहा
किसी शोख़ दरिया की तरह
फ़ना हो जाने की हसरत नहीं
डुबूँ किस तरह
वो ख्वाहिशों, का बेहिसाब मंज़र
जिसका साहिल खुला आसमाँ
यह दामन और यह दिल भी ख़ाली
मेरे नाक़ाबिले कुबूल अरमानों की तरह

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